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Monday, June 19, 2017
Tuesday, June 13, 2017
Friday, May 19, 2017
Friday, May 12, 2017
न जाने कितनी अनकही बातें
न जाने कितनी अनकही बातें, कितनी हसरतें साथ ले जाएंगे,
लोग झूठ कहते हैं कि खाली हाथ आये थे, खाली हाथ जाएंगे.
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पेट की आग को स्वाभिमान से बुझाई है!
फिरभी हर वक्त जिल्लत झिड़की पाई है!
हाँ मैं मजदूर हूँ मेहनत से नहीं घबराता!
खून सा पसीना बहाया तब रोटी खाई है!
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हम रूठे दिलों को मनाने में रह गए;
गैरों को अपना दर्द सुनाने में रह गए;
मंज़िल हमारी, हमारे करीब से गुज़र गयी;
हम दूसरों को रास्ता दिखाने में रह गए।.
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मुफ्त मे नही मांगी थी दिल मे जगह तेरे,
किराया आज तक चुका रहा हूँ आँसुओं से मेरे
दिल है ...ज़िन्दगी है...जान भी बाकी है.....
जाने क्यों फिर भी हर खुशी आधी है...!!!
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जरूरी नही है की हर किसी को मौत ही छूकर निकले..
किसी किसी को छूकर जिंदगी भी निकल जाती है.... #
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तुझे पाने की उमीद नहीं फिर भी इंतजार है
चाहत अधुरी ही सही
पर तेरे लिए बेशुमार है....
Thursday, April 13, 2017
तारीफ़' करती है जिस दिन ये दुनिया
*"'तारीफ़' करती है जिस दिन ये दुनिया 'बहुत' मेरी,*
*मैं घर जाकर 'आईने' में 'असलियत' देख लेता हूँ।*
*मेरी 'आवाज़' कभी उनकी आवाज़ से 'ऊँची' नहीं होती,*
*मैं अपने 'वालिद' की आँखों में अपना 'बचपन' देख लेता हूँ।*
*अपनी 'तन्हाई' पर जब 'तरस' आने लगता है मुझको,*
*मैं 'खिड़की' खोलकर उस 'चाँद' को देख लेता हूँ।*
*बहुत 'बेचैन' हो जाता है जब 'कभी' भी दिल मेरा,*
*मैं 'घर' जाकर अपनी 'माँ' का 'चेहरा' देख लेता हूँ।*
*खुदा से 'शिकायत' नहीं कर पाता मैं किसी 'बात' की,*
*मस्जिद' के रास्ते में रोज़ एक 'ग़रीब' को देख लेता हूँ।*
*इस 'जहाँ' की 'मोहब्बत' जब बहुत 'ज़्यादा' होने लगती है,*
*सड़क' पर पड़े किसी परिंदे का 'घोंसला' देख लेता हूँ।*
*नहीं 'चढ़ता' है मुझ पर कभी दौलत का 'ख़ुमार',*
*अक्सर' किसी 'जनाज़े' को गुज़रते देख लेता हूँ।*
*मैं घर जाकर 'आईने' में 'असलियत' देख लेता हूँ।*
*मेरी 'आवाज़' कभी उनकी आवाज़ से 'ऊँची' नहीं होती,*
*मैं अपने 'वालिद' की आँखों में अपना 'बचपन' देख लेता हूँ।*
*अपनी 'तन्हाई' पर जब 'तरस' आने लगता है मुझको,*
*मैं 'खिड़की' खोलकर उस 'चाँद' को देख लेता हूँ।*
*बहुत 'बेचैन' हो जाता है जब 'कभी' भी दिल मेरा,*
*मैं 'घर' जाकर अपनी 'माँ' का 'चेहरा' देख लेता हूँ।*
*खुदा से 'शिकायत' नहीं कर पाता मैं किसी 'बात' की,*
*मस्जिद' के रास्ते में रोज़ एक 'ग़रीब' को देख लेता हूँ।*
*इस 'जहाँ' की 'मोहब्बत' जब बहुत 'ज़्यादा' होने लगती है,*
*सड़क' पर पड़े किसी परिंदे का 'घोंसला' देख लेता हूँ।*
*नहीं 'चढ़ता' है मुझ पर कभी दौलत का 'ख़ुमार',*
*अक्सर' किसी 'जनाज़े' को गुज़रते देख लेता हूँ।*
Friday, March 31, 2017
Thursday, February 9, 2017
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